श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  1.3.82 
अथ कस्मिंश्चित् काले वेदं ब्राह्मणं जनमेजय: पौष्यश्च क्षत्रियावुपेत्य वरयित्वोपाध्यायं चक्रतु:॥ ८२॥ स कदाचिद् याज्यकार्येणाभिप्रस्थित उत्तङ्कनामानं शिष्यं नियोजयामास॥ ८३॥ भो यत् किंचिदस्मद्‍गृहे परिहीयते तदिच्छाम्यहमपरिहीयमानं भवता क्रियमाणमिति स एवं प्रतिसंदिश्योत्तङ्कं वेद: प्रवासं जगाम॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
एक समय 'जनमेजय और पौष्य' नाम के दो क्षत्रिय ब्रह्मवेत्ता आचार्य वेद के पास आये और उन्हें स्वीकार करके अपना उपाध्याय बना लिया। तत्पश्चात एक दिन उपाध्याय वेद ने यजमान के कार्य हेतु प्रस्थान करने के लिए तत्पर होकर अपने उत्तंक नामक शिष्य को अग्निहोत्र आदि के कार्य हेतु नियुक्त किया और कहा - 'पुत्र उत्तंक! यदि मेरे बिना मेरे घर में किसी वस्तु की कमी हो, तो तुम उसकी पूर्ति कर देना, यही मेरी इच्छा है।' उत्तंक को यह आदेश देकर आचार्य वेद चले गये। 82-84।
 
Once upon a time two Kshatriyas named 'Janamejaya and Paushya' came to Acharya Veda, who knew Brahman, and accepted him and made him their Upadhyaya. Thereafter one day Upadhyaya Veda, being ready to go out for the work of the Yajamana, appointed his disciple named Uttank for the work of Agnihotra etc. and said - 'Son Uttank! If there is any shortage of anything in my house without me, you should make up for it, this is my wish.' After giving this order to Uttank, Acharya Veda went out. 82-84.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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