श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.3.81 
स उपाध्यायेनानुज्ञात: समावृतस्तस्माद् गुरुकुलवासाद् गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत। तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रय: शिष्या बभूवु: स शिष्यान् न किंचिदुवाच कर्म वा क्रियतां गुरुशुश्रूषा चेति। दु:खाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान् परिक्लेशेन योजयितुं नेयेष॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उपाध्याय की आज्ञा से वे वेद समावर्तन संस्कार पूर्ण करके गुरुगृह से स्नातक होकर लौट आए। घर आकर उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। अपने घर में रहते हुए आचार्य वेद के तीन शिष्य थे, परंतु उन्होंने अपने शिष्यों को 'कर्म करो या गुरु की सेवा में लगे रहो' आदि किसी प्रकार का आदेश नहीं दिया। क्योंकि वे गुरु के घर में रहकर विद्यार्थियों को जो कष्ट सहने पड़ते हैं, उससे परिचित थे। इसीलिए उन्हें अपने शिष्यों को कष्टदायक कार्य में लगाने की कभी इच्छा नहीं होती थी। 81॥
 
Thereafter, on the permission of Upadhyay, after completing the Veda Samavartan Sanskar, he returned from Gurugriha after graduation. After coming home he entered Grihasthashram. While living in his house, Acharya Veda had three disciples, but he did not give any kind of order to his disciples like 'do work or be engaged in Guru's service' etc. Because he was familiar with the hardships that students have to endure while living in the Guru's house. That is why he never had any desire to involve his disciples in painful work. 81॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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