श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  1.3.80 
तत्परितोषाच्च श्रेय: सर्वज्ञतां चावाप। एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
गुरु की प्रसन्नता से वेदों को योग्यता और सर्वज्ञता प्राप्त हुई। इस प्रकार वेदों की परीक्षा की कथा कही गई। 80.
 
Due to the satisfaction of the Guru, the Vedas attained merit and omniscience. Thus the story of the test of the Vedas was narrated. 80.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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