| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 1.3.8  | | स तया क्रुद्धया तत्रोक्तोऽयं मे पुत्रो न किंचिदपराध्यति नावेक्षते हवींषि नावलेढि किमर्थमभिहत इति॥ ८॥ | | | | | | अनुवाद | | वहाँ क्रोध से भरकर सरमा ने जनमेजय से कहा, 'मेरे इस पुत्र ने तुम्हारा कोई अहित नहीं किया है, इसने न तो हवि की ओर देखा है और न ही उसे चाटा है, फिर तुमने इसे क्यों मारा?' | | | | There, filled with rage, Sarma said to Janamejaya, 'This son of mine has done you no wrong, he has neither looked at the offering nor licked it, then why did you kill him?' | | ✨ ai-generated | | |
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