श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  1.3.72 
स एवमुक्त: प्रत्युवाच—एतत् प्रत्यनुनये भवन्तावश्विनौ नोत्सहेऽहमनिवेद्य गुरवेऽपूप-मुपयोक्तुमिति॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर उपमन्यु ने कहा - "इसके लिए मैं आप दोनों अश्विनकुमारों से प्रार्थना करता हूँ। गुरु की आज्ञा के बिना मैं यह केक नहीं खा सकता।" ॥72॥
 
On hearing this Upamanyu replied, "For this I request both of you Ashvin Kumars. I cannot eat this cake without the permission of my Guru." ॥ 72॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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