श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  1.3.70 
स एवमुक्त: प्रत्युवाच नानृतमूचतुर्भगवन्तौ न त्वहमेतमपूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेऽनिवेद्येति॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
उनके ऐसा कहने पर उपमन्यु बोला - 'भगवन्! आप ठीक कहते हैं, किन्तु मैं अपने गुरु से प्रार्थना किये बिना इस केक का उपयोग नहीं कर सकता।'
 
On his saying this, Upmanyu said - 'Lord! You are right, however, I cannot use this cake without requesting my Guru.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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