श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.3.66 
तौ नासत्यावश्विनौ वां महेऽहं
स्रजं च यां बिभृथ: पुष्करस्य।
तौ नासत्यावमृतावृतावृधा-
वृते देवास्तत्प्रपदे न सूते॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
अश्विनीकुमारो! आप दोनों 'नासत्य' नाम से प्रसिद्ध हैं। मैं आपकी तथा आपके द्वारा धारण की गई कमल पुष्पों की माला की पूजा करता हूँ। आप अमर होने के साथ-साथ सत्य के पोषक और प्रसारक भी हैं। आपके सहयोग के बिना देवता भी उस शाश्वत सत्य को प्राप्त करने में समर्थ नहीं हैं। 66।
 
Ashwinikumaro! Both of you are famous by the name of 'Nasatya'. I worship you and the garland of lotus flowers that you are wearing. Apart from being immortal, you are the nurturer and spreader of truth. Without your cooperation, even the gods are not capable of attaining that eternal truth. 66.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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