| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 65 |
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| | | | श्लोक 1.3.65  | युवां वर्णान् विकुरुथो विश्वरूपां-
स्तेऽधिक्षियन्ते भुवनानि विश्वा।
ते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति
देवा मनुष्या: क्षितिमाचरन्ति॥ ६५॥ | | | | | | अनुवाद | | हे अश्विनीकुमारों! आप नाना प्रकार के रंगों की वस्तुओं को मिलाकर नाना प्रकार की औषधियाँ तैयार करते हैं, जिनसे सम्पूर्ण जगत का पोषण होता है। वे चमकती हुई औषधियाँ सदैव आपका अनुसरण करती हैं और आपके साथ-साथ चलती हैं। देवता, मनुष्य तथा अन्य प्राणी स्वर्ग तथा मृत्युलोक में रहते हुए अपने-अपने अधिकार के अनुसार उन औषधियों का सेवन करते हैं ॥ 65॥ | | | | O Ashwinikumaras! You prepare all kinds of medicines by mixing things of various colours, which nourish the entire world. Those shining medicines always follow you and move along with you. Gods, humans and other creatures consume those medicines according to their rights while living in the heaven and the mortal world. ॥ 65॥ | | ✨ ai-generated | | |
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