| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 64 |
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| | | | श्लोक 1.3.64  | युवां दिशो जनयथो दशाग्रे
समानं मूर्ध्नि रथयानं वियन्ति।
तासां यातमृषयोऽनुप्रयान्ति
देवा मनुष्या: क्षितिमाचरन्ति॥ ६४॥ | | | | | | अनुवाद | | हे अश्विनीकुमारों! आप दोनों सृष्टि के आरंभ में पूर्व से पूर्व तक दसों दिशाओं को प्रकट करते हैं और उनका ज्ञान देते हैं। उन दिशाओं के अग्रभाग अर्थात् अंतरिक्ष-लोक में रथ पर विचरण करने वाले तथा सबको समान रूप से प्रकाश देने वाले सूर्यदेव का तथा आकाश आदि पंचभूतों का भी ज्ञान देते हैं। सूर्य को उन दिशाओं में जाते देखकर ऋषिगण भी उनके पीछे-पीछे जाते हैं तथा देवता और मनुष्य (अपनी-अपनी सत्ता के अनुसार) स्वर्गलोक या मृत्युलोक की भूमिका का प्रयोग करते हैं। | | | | O Ashwinikumaras! Both of you reveal the ten directions from east to east at the beginning of creation and give knowledge about them. You also give knowledge about the Sun God who travels in a chariot in the head of those directions i.e. the space-world and gives light equally to everyone and also about the five elements like sky. Seeing the Sun going in those directions, the sages also follow him and the gods and humans (according to their authority) use the role of heaven or the mortal world. 64. | | ✨ ai-generated | | |
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