श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.3.63 
अश्विनाविन्दुममृतं वृत्तभूयौ
तिरोधत्तामश्विनौ दासपत्नी।
हित्वा गिरिमश्विनौ गा मुदा चरन्तौ
तद्‍वृष्टिमह्ना प्रस्थितौ बलस्य॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ही गुणों से संपन्न हो। अपनी यश-कीर्ति से तुम चंद्रमा, अमृत और जल की चमक को भी तुच्छ समझते हो। इस समय तुम मेरु पर्वत को छोड़कर पृथ्वी पर सुखपूर्वक विचरण कर रहे हो। तुम दोनों भाई केवल सुख और बल की वर्षा करने के लिए ही दिन में प्रस्थान करते हो।
 
O Ashwinikumaras! Both of you are endowed with virtue. With your good fame you make the moon, nectar and the brightness of water look contemptible. At present, leaving Mount Meru, you are roaming happily on the earth. Both of you brothers set out during the day only to shower happiness and strength.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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