श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.3.62 
एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं
षण्णाभिमेकाक्षमृतस्य धारणम्।
यस्मिन् देवा अधि विश्वे विषक्ता-
स्तावश्विनौ मुञ्चतं मा विषीदतम्॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
अश्विनीकुमार! मेष आदि बारह राशियाँ जिनके बारह चक्र हैं, छः नाभि वाली छः ऋतुएँ तथा एक अक्ष वाला संवत्सर, वही एक कालचक्र सर्वत्र घूम रहा है। यही कर्मफलों को धारण करने वाला आधार है। काल का अभिमान करने वाले सभी देवता इसी में स्थित हैं। आप दोनों मुझे इस कालचक्र से मुक्त करने की कृपा करें, क्योंकि मैं यहाँ जन्म आदि के दुःख से बहुत दुःख भोग रहा हूँ॥ 62॥
 
Ashwinikumar! The twelve zodiac signs like Aries etc. which have twelve wheels, the six seasons which have six navels and the Samvatsar which has one axis, that one and only time cycle is moving everywhere. This is the base which holds the results of karma. All the gods who are proud of time are situated in this. Both of you please free me from this time cycle, because I am suffering a lot here due to the pain of birth etc.॥ 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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