श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  1.3.61 
एकां नाभिं सप्तशता अरा: श्रिता:
प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अरा:।
अनेमि चक्रं परिवर्ततेऽजरं
मायाश्विनौ समनक्ति चर्षणी॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
हे अश्विनीकुमारों! एकमात्र संवत्सर इस कालचक्र की नाभि है, जिस पर रात्रि और दिन रूपी सात सौ बीस तीलियाँ एक साथ टिकी हुई हैं। ये सभी तीलियों को धारण करने वाले नितम्बों (सिरों) के रूप में बारह महीनों से जुड़ी हुई हैं। अश्विनीकुमारों! यह अविनाशी और मायामय कालचक्र बिना किसी नियम के एक निश्चित गति से घूमता रहता है और इस लोक तथा परलोक, दोनों लोकों के लोगों का नाश करता रहता है॥ 61॥
 
O Ashwinikumaras! The only Samvatsar is the navel of this time wheel, on which seven hundred and twenty spokes of night and day together are resting. All of them are attached to the twelve months in the form of the heads (buttocks holding the spokes). Ashwinikumaras! This indestructible and illusory time wheel rotates at a fixed speed without any routine and keeps on destroying the people of both the worlds, this world and the other world.॥ 61॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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