श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.3.6 
स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किंचिन्नावेक्षे हवींषि नावलिह इति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तब उसने पुनः अपनी माँ से कहा - 'मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैंने न तो उसके भोजन की ओर देखा है, न ही उसे चाटा है।'
 
Then he again told his mother thus - 'I have not committed any crime. I have neither looked at her food nor licked it.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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