श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.3.59 
ग्रस्तां सुपर्णस्य बलेन वर्तिका-
ममुञ्चतामश्विनौ सौभगाय।
तावत् सुवृत्तावनमन्त मायया
वसत्तमा गा अरुणा उदावहन्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
दिव्य काल शक्ति ने जीव पक्षी को अपना ग्रास बना लिया है। आप दोनों अश्विनी कुमार नामक जीव महापुरुषों ने ज्ञान प्रदान करके जीव को काल के बंधन से मुक्त कर दिया है और कैवल्य रूपी महान सौभाग्य की प्राप्ति कराई है। माया के साथी अत्यन्त अज्ञानी जीव जब तक अपनी इन्द्रियों के आगे नतमस्तक रहते हैं, तब तक वे अपने को शरीर से बंधा हुआ मानते हैं। 59॥
 
The divine Kaal Shakti has made the living bird its prey. Both of you great men of life named Ashwini Kumar have freed the living being from the bondage of time by imparting knowledge and attaining great good fortune in the form of Kaivalya. As long as the extremely ignorant creatures who are the companions of Maya remain bowed down before their senses, they consider themselves bound by the body. 59॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas