श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.3.58 
हिरण्मयौ शकुनी साम्परायौ
नासत्यदस्रौ सुनसौ वै जयन्तौ।
शुक्लं वयन्तौ तरसा सुवेमा-
वधिव्ययन्तावसितं विवस्वत:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
तुम दोनों भाई सुनहरे पंखों वाले दो सुंदर पक्षियों के समान अत्यंत सुंदर हो। तुम आध्यात्मिक उन्नति के साधनों से संपन्न हो। नासत्य और दस्र तुम्हारे नाम हैं। तुम्हारी नाक अत्यंत सुंदर है। तुम दोनों अवश्य विजय प्राप्त करने वाले हो। तुम विवस्वान (सूर्यदेव) के पुत्र हो; अतः सूर्यस्वरूप में स्थित होकर दिन और रात के काले तंतुओं से वर्षरूपी वस्त्र बुनते रहते हो और उस वस्त्र से दूसरों को शीघ्रतापूर्वक देवयान और पितृयान नामक सुंदर मार्गों की प्राप्ति कराते हो। 58
 
Like two beautiful birds with golden wings, both of you brothers are very beautiful. You are endowed with the means of spiritual advancement. Nasatya and Dasra are your names. Your nose is very beautiful. Both of you are definitely going to achieve victory. You are the sons of Vivasvan (the Sun God); therefore, being situated in the form of the Sun, you keep weaving the cloth of the year from the black fibers of day and night and with that cloth you swiftly make others attain the beautiful paths named Devayana and Pitryana. 58.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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