श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.3.57 
प्रपूर्वगौ पूर्वजौ चित्रभानू
गिरा वाऽऽशंसामि तपसा ह्यनन्तौ।
दिव्यौ सुपर्णौ विरजौ विमाना-
वधिक्षिपन्तौ भुवनानि विश्वा॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे अश्विनीकुमारों! आप दोनों सृष्टि के पूर्व से हैं। आप पूर्वज हैं। आप चित्रभानु हैं। मैं वाणी और तप द्वारा आपकी स्तुति करता हूँ; क्योंकि आप अनंत हैं। आप दिव्य स्वरूप हैं। सुंदर पंखों वाले दो पक्षियों की तरह आप सदैव एक साथ रहते हैं। आप रजोगुण से रहित हैं और अभिमान से रहित हैं। आप संपूर्ण जगत में आरोग्य का प्रसार करते हैं। 57।
 
O Ashwinikumaras! You both existed before the creation. You are the ancestors. You are Chitrabhanu. I praise you through speech and penance; because you are endless. You are divine in nature. You are always together like two birds with beautiful wings. You are devoid of Rajoguna and are devoid of pride. You spread health in the entire world. 57.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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