श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  1.3.55 
स उपाध्यायं प्रत्युवाच—अर्कपत्राणि भक्षयित्वान्धीभूतोऽस्म्यत: कूपे पतित इति॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उसने उपाध्याय को उत्तर दिया - 'भगवन्! मैं आक के पत्ते खाकर अंधा हो गया हूँ, इसलिए कुएँ में गिर गया।'
 
He replied to the Upadhyaya - 'Lord! I have become blind after eating Aak leaves; that is why I fell into the well.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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