श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  1.3.54 
स उपाध्यायवचनं श्रुत्वा प्रत्युवाचोच्चैरयमस्मिन् कूपे पतितोऽहमिति तमुपाध्याय: प्रत्युवाच कथं त्वमस्मिन् कूपे पतित इति॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
उपाध्याय के वचन सुनकर उसने ऊंचे स्वर में उत्तर दिया - ‘गुरुजी, मैं कुएँ में गिर गया हूँ।’ तब उपाध्याय ने उससे पूछा - ‘बेटा, तुम कुएँ में कैसे गिरे?’॥ 54॥
 
On hearing Upadhyaya's words, he replied in a loud voice - 'Guruji, I have fallen in the well.' Then Upadhyaya asked him - 'Son, how did you fall in the well?'॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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