श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.3.53 
तानाह उपाध्यायो मयोपमन्यु: सर्वत: प्रतिषिद्ध: स नियतं कुपितस्ततो नागच्छति चिरं ततोऽन्वेष्य इत्येवमुक्त्वा शिष्यै: सार्धमरण्यं गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार भो उपमन्यो क्वासि वत्सैहीति॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तब उपाध्याय बोले, "मैंने उपमन्यु की जीविका के सब मार्ग बंद कर दिए हैं, इसलिए वह अवश्य ही परेशान हो गया होगा; इसीलिए इतने समय बाद भी वह नहीं आया है, अतः हमें जाकर उसे ढूँढ़ना चाहिए।" ऐसा कहकर उपाध्याय अपने शिष्यों के साथ वन में गए और उसे पुकारा, "हे उपमन्यु! तुम कहाँ हो? बेटा? इधर आओ।" ॥53॥
 
Then the Upadhyaya said, "I have blocked all the avenues of livelihood for Upamanyu, so he must have become upset; that is why he has not come even after so much time, so we must go and look for him." Saying so, the Upadhyaya went to the forest with his disciples and called out to him, "O Upamanyu! Where are you son? Come here." ॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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