श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.3.51 
स तैरर्कपत्रैर्भक्षितै: क्षारतिक्तकटुरूक्षैस्तीक्ष्णविपाकैश्चक्षुष्युपहतोऽन्धो बभूव। तत: सोऽन्धोऽपि चङ्क्रम्यमाण: कूपे पपात ॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
आक के पत्ते नमकीन, तीखे, कड़वे और रूखे होते हैं। उनकी तासीर तीक्ष्ण होती है (पाचन के समय वे पेट में एक प्रकार की ज्वाला उत्पन्न करते हैं); अतः उन्हें खाने से उपमन्यु की दृष्टि चली गई। वह अंधा हो गया। अंधा होते हुए भी वह इधर-उधर घूमता रहता था; अतः वह कुएँ में गिर पड़ा॥ 51॥
 
The leaves of Aak are salty, sharp, bitter and dry. Their effect is sharp (during digestion they create a kind of flame inside the stomach); hence by eating them Upamanyu lost his eyesight. He became blind. Despite being blind he kept roaming here and there; hence he fell into the well.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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