| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 49 |
|
| | | | श्लोक 1.3.49  | | तमुपाध्याय: प्रत्युवाच—एते त्वदनुकम्पया गुणवन्तो वत्सा: प्रभूततरं फेनमुद्गिरन्ति। तदेषामपि वत्सानां वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमान:। फेनमपि भवान् न पातुमर्हतीति। स तथेति प्रतिश्रुत्य पुनररक्षद् गा:॥ ४९॥ | | | | | | अनुवाद | | यह सुनकर उपाध्याय बोले, ‘ये बछड़े उत्तम गुणों से संपन्न हैं, अतः ये तुम पर दया करके बहुत सारा झाग उगल रहे होंगे। अतः तुम झाग पीकर इन सभी बछड़ों के जीवन-यापन में विघ्न डाल रहे हो, अतः आज से तुम झाग मत पीना।’ उपमन्यु ने कहा, ‘बहुत अच्छा’ और उसे न पीने का संकल्प लेकर पहले की भांति गौओं की रक्षा करने लगा। | | | | Hearing this, Upadhyaya said, 'These calves are endowed with excellent qualities, so they must be spitting out a lot of foam out of pity for you. Therefore, by drinking the foam, you are creating problems in the livelihood of all these calves, so from today onwards, do not drink the foam.' Upamanyu said, 'Very good' and took a vow not to drink it and started protecting the cows as before. | | ✨ ai-generated | | |
|
|