| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 47 |
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| | | | श्लोक 1.3.47  | | तमुपाध्याय: पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो भैक्ष्यं नाश्नासि न चान्यच्चरसि पयो न पिबसि पीवानसि भृशं केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति॥ ४७॥ | | | | | | अनुवाद | | उपाध्याय ने उसे अब भी स्वस्थ और बलवान देखकर पूछा, "बेटा उपमन्यु! तुम भिक्षा से प्राप्त अन्न नहीं खाते, पुनः भिक्षा नहीं मांगते और गायों का दूध भी नहीं पीते; फिर भी तुम बहुत मोटे हो। इस समय तुम कैसे जीवित रहते हो?"॥4 7॥ | | | | Upadhyaya, seeing him still healthy and strong, asked him, "Son Upamanyu! You do not eat food obtained through alms, do not beg for alms again and do not even drink the milk of cows; still you are very fat. How do you survive at this time?"॥ 4 7॥ | | ✨ ai-generated | | |
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