श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.3.45 
स एवमुक्तस्तमुपाध्यायं प्रत्युवाच भो एतासां गवां पयसा वृत्तिं कल्पयामीति। तमुवाचोपाध्यायो नैतन्न्याय्यं पय उपयोक्तुं भवतो मया नाभ्यनुज्ञातमिति॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पूछने पर उपमन्यु ने उपाध्याय से कहा, ‘हे प्रभु! मैं इन गायों के दूध से अपना जीवनयापन करता हूँ।’ (यह सुनकर) उपाध्याय ने उससे कहा, ‘मैंने तुम्हें दूध पीने की आज्ञा नहीं दी है, इसलिए इन गायों का दूध पीना तुम्हारे लिए अनुचित है।’
 
On being asked in this manner, Upamanyu replied to Upadhyaya, 'O Lord! I earn my living from the milk of these cows.' (On hearing this) Upadhyaya said to him, 'I have not permitted you to drink milk, therefore it is inappropriate for you to use the milk of these cows.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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