तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच वत्सोपमन्यो अहं ते सर्वं भैक्ष्यं गृह्णामि न चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्तिं कल्पयसीति॥ ४४॥
अनुवाद
उपाध्याय ने उसे अभी भी मोटा और स्वस्थ देखकर पूछा- 'बेटा उपमन्यु! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ और अब तुम फिर कभी भिक्षा नहीं माँगते, फिर भी तुम बहुत मोटे हो गए हो। इन दिनों तुम कैसे खाते-पीते हो?'॥ 44॥
Upadhyaya saw him still fat and healthy and asked- 'Son Upmanyu! I take all your alms and now you do not ask for alms again, still you are very fat. How do you manage to eat and drink these days?'॥ 44॥