श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.3.44 
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच वत्सोपमन्यो अहं ते सर्वं भैक्ष्यं गृह्णामि न चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्तिं कल्पयसीति॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उपाध्याय ने उसे अभी भी मोटा और स्वस्थ देखकर पूछा- 'बेटा उपमन्यु! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ और अब तुम फिर कभी भिक्षा नहीं माँगते, फिर भी तुम बहुत मोटे हो गए हो। इन दिनों तुम कैसे खाते-पीते हो?'॥ 44॥
 
Upadhyaya saw him still fat and healthy and asked- 'Son Upmanyu! I take all your alms and now you do not ask for alms again, still you are very fat. How do you manage to eat and drink these days?'॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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