श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.3.43 
स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत्। रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रत: स्थित्वा नमश्चक्रे॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उसने गुरु की आज्ञा 'तथास्तु' कहकर शिरोधार्य की और पूर्ववत् गौओं की रक्षा करने लगा। एक दिन गौएँ चराकर वह पुनः (सायं काल) उपाध्याय के घर आया और उनके सामने खड़े होकर उसने उन्हें नमस्कार किया॥ 43॥
 
He obeyed the Guru's command saying 'Tathastu' and started protecting the cows as before. One day, after grazing the cows, he again came (in the evening) to Upadhyaya's house and standing in front of him, he greeted him.॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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