श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.3.40 
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्ष्यं गृह्णामि केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
उपमन्यु को उस अवस्था में भी स्वस्थ और बलवान देखकर उपाध्याय ने पूछा - 'बेटा उपमन्यु! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ, फिर अब तुम अपना निर्वाह कैसे करते हो?'॥40॥
 
Seeing Upamanyu healthy and strong even in that condition, the Upadhyaya asked - 'Son Upamanyu! I take all your alms, then how do you sustain yourself now?'॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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