श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.3.39 
स तस्मादुपाध्याय: सर्वमेव भैक्ष्यमगृह्णात्। स तथेत्युक्त्वा पुनररक्षद् गा:। अहनि रक्षित्वा निशामुखे गुरुकुलमागम्य गुरोरग्रत: स्थित्वा नमश्चक्रे॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उपाध्याय उपमन्यु से सारी भिक्षा ले लेते थे। 'तथास्तु' कहकर उपमन्यु फिर पहले की तरह गौओं की रक्षा करने लगा। वह दिन भर गौओं की रक्षा करता और (सायंकाल) गुरु के घर आकर गुरु के सामने खड़ा होकर उन्हें नमस्कार करता। 39.
 
Upadhyaya used to take all the alms from Upamanyu. Saying 'Tathastu', Upamanyu again started protecting the cows as before. He used to protect the cows the whole day and (in the evening) he used to come to the Guru's house and stand in front of the Guru and greet him. 39.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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