श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.3.37 
स उपाध्यायं प्रत्युवाच भो भैक्ष्येण वृत्तिं कल्पयामीति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उसने उपाध्याय से कहा - 'गुरुदेव! मैं भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करता हूँ।'
 
He said to Upadhyaya - 'Gurudev! I earn my living by begging.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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