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mahabharat 1.3.29: तब मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे कहा, "प्रभु! यह मैं हूँ। मैं स्वयं यहाँ फूलों की क्यारी के टूटे हुए तटबंध से बहते हुए अपरिहार्य जल को रोकने के लिए लेटा था। आपकी आवाज़ सुनते ही मैं अचानक उस तटबंध को तोड़कर आपके पास आकर खड़ा हो गया।"   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.3.29 
प्रोवाच चैनमयमस्म्यत्र केदारखण्डे नि:सरमाणमुदकमवारणीयं संरोद्धुं संविष्टो भगवच्छब्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे कहा, "प्रभु! यह मैं हूँ। मैं स्वयं यहाँ फूलों की क्यारी के टूटे हुए तटबंध से बहते हुए अपरिहार्य जल को रोकने के लिए लेटा था। आपकी आवाज़ सुनते ही मैं अचानक उस तटबंध को तोड़कर आपके पास आकर खड़ा हो गया।"
 
Then I humbly said to him, 'Lord! This is me. I myself had laid down here to stop the inevitable water flowing from the broken embankment of the flowerbed. As soon as I heard your voice, I suddenly broke that embankment and came and stood beside you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)