श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.3.28 
स तच्छ्रुत्वा आरुणिरुपाध्यायवाक्यं तस्मात् केदारखण्डात् सहसोत्थाय तमुपाध्यायमुपतस्थे॥ २८॥
 
 
अनुवाद
उपाध्याय के ये वचन सुनकर आरुणि पांचाल सहसा पुष्प-शैल के किनारे से उठकर उपाध्याय के पास आकर खड़े हो गए॥ 28॥
 
On hearing these words of the Upadhyaya, Aruni Panchala suddenly got up from the edge of the flowerbed and came and stood near the Upadhyaya.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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