श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.3.27 
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार। भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वहाँ जाकर उपाध्याय ने उसे पुकारा - 'पांचालवासी आरुणि, मेरे पुत्र, तुम कहाँ हो? इधर आओ।'
 
Going there the Upadhyaya called out to him - 'Aruni, resident of Panchala, where are you my son? Come here.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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