श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.3.24 
स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वह स्वयं उस स्थान पर लेट गया जहाँ फूलों की क्यारी की टूटी हुई मेड़ थी। उसके लेटते ही वहाँ बहता हुआ पानी रुक गया॥24॥
 
He himself lay down at the place where the broken ridge of the flowerbed was. As he lay down, the flowing water there stopped.॥ 24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas