| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 23 |
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| | | | श्लोक 1.3.23  | | स उपाध्यायेन संदिष्ट आरुणि: पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत् केदारखण्डं बद्धुं नाशकत्। स क्लिश्यमानोऽपश्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामि॥ २३॥ | | | | | | अनुवाद | | उपाध्यायजी की इस प्रकार आज्ञा पाकर पांचाल देश का निवासी आरुणि वहाँ गया और धान के खेत के चारों ओर सीमा बनाने लगा, परन्तु वह ऐसा न कर सका। सीमा बनाने में परिश्रम करते हुए उसने एक उपाय सोचा और मन ही मन कहा - 'ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा।'॥ 23॥ | | | | On being ordered by Upadhyaya in this manner, Aruni, a resident of Panchal country, went there and started to build a boundary around the paddy field, but he could not do so. While working hard to build the boundary, he thought of a solution and said to himself, 'Okay, I will do this.'॥ 23॥ | | ✨ ai-generated | | |
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