श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.3.22 
स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं बधानेति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
एक दिन उपाध्याय ने अपने एक शिष्य आरुणि को, जो पांचाल देश का निवासी था, खेत में भेजा और कहा, 'बेटा! जाकर क्यारियों की टूटी हुई मेड़ों को ठीक कर दो।'
 
One day Upadhyaya sent one of his disciples Aruni, a resident of Panchal country, to the field and said, 'Son! Go and mend the broken ridges of the flowerbeds.'
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas