श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  1.3.186 
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह।
उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा॥ १८६॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - महर्षियों! यह समाचार सुनकर राजा जनमेजय तक्षक पर क्रोधित हो उठे। उत्तंक के वचनों ने उनके क्रोध की अग्नि में घी डालने का काम किया। जिस प्रकार घी की आहुति देने से अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसी प्रकार वह अत्यंत क्रोधित हो उठे।
 
Ugrasravaji says - Maharishis! On hearing this news, King Janamejaya became furious on Takshak. Uttank's words added fuel to the fire of his anger. Just as fire ignites when ghee is offered as an oblation, in the same way he became extremely furious.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)