श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  1.3.183 
होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने।
सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद् विधीयताम्॥ १८३॥
 
 
अनुवाद
अतः महाराज, आप सर्प की बलि का अनुष्ठान करें और उसकी प्रज्वलित अग्नि में पापी की आहुति दें; और इस कार्य को यथाशीघ्र पूर्ण करें ॥183॥
 
Therefore, Maharaj, you should perform the ritual of sacrificing the serpent and sacrifice the sinner in its blazing fire; and complete this task as quickly as possible.॥ 183॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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