श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.3.18 
अस्य त्वेकमुपांशुव्रतं यदेनं कश्चिद् ब्राह्मण: कंचिदर्थमभियाचेत् तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
परन्तु इसका एक गुप्त नियम है। यदि कोई ब्राह्मण इसके पास आकर कुछ भी माँगे, तो यह उसे अवश्य ही इच्छित वस्तु प्रदान करती है। यदि तुम इसके इस व्यवहार को उदारतापूर्वक सहन कर सको अथवा इसकी इच्छा पूरी करने में उत्साह दिखा सको, तो इसे ले जाओ।॥18॥
 
But it has a secret rule. If a Brahmin comes to it and requests for anything, it will surely give him the desired thing. If you can tolerate this behaviour of its generously or show enthusiasm in fulfilling its desire, then take it away.'॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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