Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.3.179: मैं समझता हूँ कि शत्रु संहार हेतु शास्त्रों में वर्णित सर्प बलि का अनुष्ठान करने का यही उचित अवसर है। अतः हे राजन, आपको अपने पितामह की मृत्यु का बदला अवश्य लेना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 179
 
 
श्लोक  1.3.179 
कार्यकालं हि मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मण:।
तद्‍गच्छापचितिं राजन् पितुस्तस्य महात्मन:॥ १७९॥
 
 
अनुवाद
मैं समझता हूँ कि शत्रु संहार हेतु शास्त्रों में वर्णित सर्प बलि का अनुष्ठान करने का यही उचित अवसर है। अतः हे राजन, आपको अपने पितामह की मृत्यु का बदला अवश्य लेना चाहिए।
 
I think that this is the right opportunity to perform the ritual of sacrificing the snake, which has been described in the scriptures to kill the enemy. Therefore, O King, you must avenge the death of your great father.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)