| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 177 |
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| | | | श्लोक 1.3.177  | सौतिरुवाच
स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन
द्विजोत्तम: पुण्यकृतां वरिष्ठ:।
उवाच राजानमदीनसत्त्वं
स्वमेव कार्यं नृपते कुरुष्व॥ १७७॥ | | | | | | अनुवाद | | उग्रश्रवाजी कहते हैं - राजाओं में श्रेष्ठ जनमेजय की यह बात सुनकर पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ उत्तंक नामक महाब्राह्मण ने उस उदारहृदय राजा से कहा - 'महाराज! वह कार्य मेरा नहीं, आपका है; आप ही उसे करें॥177॥ | | | | Ugrasravaji says - On hearing this from the best of kings, Janamejaya, the great Brahmin Uttank, the foremost among pious souls, said to that generous-hearted king - 'Maharaj! That work is not mine, it is yours; you must do it.'॥ 177॥ | | ✨ ai-generated | | |
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