श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 176
 
 
श्लोक  1.3.176 
जनमेजय उवाच
आसां प्रजानां परिपालनेन
स्वं क्षत्रधर्मं परिपालयामि।
प्रब्रूहि मे किं करणीयमद्य
येनासि कार्येण समागतस्त्वम्॥ १७६॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्रह्मन्! मैं इन प्रजा की रक्षा करके अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करता हूँ। बताइए, आज मुझे कौन-सा कार्य करना है? जिसके कारण आप यहाँ आये हैं।
 
Janamejaya said - O Brahman! I follow my Kshatriya Dharma by protecting these subjects. Tell me, what work is there for me to do today? Because of which you have come here.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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