श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 171
 
 
श्लोक  1.3.171 
स हास्तिनपुरं प्राप्य न चिराद् विप्रसत्तम:।
समागच्छत राजानमुत्तङ्को जनमेजयम्॥ १७१॥
 
 
अनुवाद
हस्तिनापुर पहुँचते ही महान ब्राह्मण उत्तंक की भेंट राजा जनमेजय से हुई।
 
Soon after reaching Hastinapur the great Brahmin Uttank met King Janamejaya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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