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mahabharat 1.3.170: ‘अतः सौम्य! अब तुम जाओ, मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ। तुम्हारा कल्याण होगा।’ उपाध्याय की आज्ञा पाकर उत्तंक तक्षक पर क्रोधित हो उठे और उससे बदला लेने की इच्छा से हस्तिनापुर की ओर चल पड़े।   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  1.3.170 
तत् सौम्य गम्यतामनुजाने भवन्तं श्रेयोऽवाप्स्यसीति। स उपाध्यायेनानुज्ञातो भगवानुत्तङ्क: क्रुद्धस्तक्षकं प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे॥ १७०॥
 
 
अनुवाद
‘अतः सौम्य! अब तुम जाओ, मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ। तुम्हारा कल्याण होगा।’ उपाध्याय की आज्ञा पाकर उत्तंक तक्षक पर क्रोधित हो उठे और उससे बदला लेने की इच्छा से हस्तिनापुर की ओर चल पड़े।
 
‘So, Saumya! Now you go, I give you permission to go. You will be blessed.’ On receiving the orders of Upadhyaya, Uttank became angry with Takshak and set out towards Hastinapur with the desire to take revenge from him. 170.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)