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श्री महाभारत
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पर्व 1: आदि पर्व
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अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना
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श्लोक 17
श्लोक
1.3.17
समर्थोऽयं भवत: सर्वा: पापकृत्या: शमयितुमन्तरेण महादेवकृत्याम्॥ १७॥
अनुवाद
यह तुम्हारे समस्त पापों (शापजन्य कष्टों) को नष्ट करने में समर्थ है। यह केवल भगवान शंकर के कार्यों को ही नहीं टाल सकता॥17॥
It is capable of eliminating all your sins (troubles caused by curses). It cannot avert only the actions of Lord Shankar.॥ 17॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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