श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  1.3.169 
स हि भगवानिन्द्रो मम सखा त्वदनुक्रोशादिममनुग्रहं कृतवान्। तस्मात् कुण्डले गृहीत्वा पुनरागतोऽसि॥ १६९॥
 
 
अनुवाद
'इन्द्रदेव मेरे मित्र हैं। उन्होंने आप पर कृपा करके यह उपकार किया है। इसीलिए आप दोनों कुण्डल लेकर यहाँ आए हैं।' 169.
 
'Lord Indra is my friend. He has shown this favour by showing mercy on you. This is the reason why you have returned here with both the earrings. 169.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd