श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  1.3.167 
य: पुरुष: स पर्जन्यो योऽश्व: सोऽग्निर्य ऋषभस्त्वया पथि गच्छता दृष्ट: स ऐरावतो नागराट्॥ १६७॥
 
 
अनुवाद
'वह पुरुष पर्जन्य (इंद्र) है। घोड़ा अग्नि है। यहाँ से जाते हुए तुमने जो बैल देखा, वह सर्पों का राजा ऐरावत है।' 167.
 
‘The man is Parjanya (Indra). The horse is Agni. The bull you saw on the way from here is the King of Snakes, Airavat. 167.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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