श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  1.3.163 
तत्र च मया चक्रं दृष्टं द्वादशारं षट् चैनं कुमारा: परिवर्तयन्ति तदपि किम्। पुरुषश्चापि मया दृष्ट: स चापि क:। अश्वश्चातिप्रमाणो दृष्ट: स चापि क:॥ १६३॥
 
 
अनुवाद
वहाँ मैंने बारह आरोंवाला एक चक्र भी देखा। छः कुमार उस चक्र को घुमा रहे थे। वह क्या था? वहाँ मैंने एक मनुष्य भी देखा। वह कौन था? और मैंने एक बहुत बड़ा घोड़ा भी देखा। वह कौन था?॥163॥
 
‘There I also saw a wheel with twelve spokes. Six Kumars were turning that wheel. What was that? I also saw a man there. Who was he? And I also saw a very big horse. Who was that?॥ 163॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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