श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  1.3.161 
तमुत्तङ्क उपाध्यायं प्रत्युवाच भोस्तक्षकेण मे नागराजेन विघ्न: कृतोऽस्मिन् कर्मणि तेनास्मि नागलोकं गत:॥ १६१॥
 
 
अनुवाद
तब उत्तंक ने उपाध्याय से कहा- 'भगवन्! सर्पराज तक्षक ने इस कार्य में विघ्न डाला था। इसीलिए मैं नागलोक गया था।' 161.
 
Then Uttanka replied to Upadhyaya- 'Lord! King of snakes Takshak had created an obstacle in this work. That is why I had gone to Nagaloka. 161.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd