| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 16 |
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| | | | श्लोक 1.3.16  | | स एवमुक्त: प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रोऽयं मम सर्प्यां जातो महातपस्वी स्वाध्याय-सम्पन्नो मत्तपोवीर्यसम्भृतो मच्छुक्रं पीतवत्यास्तस्या: कुक्षौ जात:॥ १६॥ | | | | | | अनुवाद | | उनके ऐसा कहने पर श्रुतश्रवण ने जनमेजय को इस प्रकार उत्तर दिया - 'महाराज जनमेजय! मेरा यह पुत्र सोमश्रवा एक सर्पिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ है। यह महान तपस्वी और अध्ययनशील है। मेरे तप के बल से इसका पालन-पोषण हुआ है। एक बार एक सर्पिणी ने मेरा वीर्यपान कर लिया था, इसलिए यह उसके गर्भ से उत्पन्न हुआ है॥ 16॥ | | | | On his saying this, Shrutashravana replied to Janamejaya thus - 'Maharaj Janamejaya! This son of mine, Somashrava, was born from the womb of a female serpent. He is a great ascetic and studious. He has been nourished by the power of my penance. Once a female serpent had drunk my semen, hence he was born from her womb.॥ 16॥ | | ✨ ai-generated | | |
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