श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 159
 
 
श्लोक  1.3.159 
उत्तङ्क देशे कालेऽभ्यागत: स्वागतं ते वत्स त्वमनागसि मया न शप्त: श्रेयस्तवोपस्थितं सिद्धिमाप्नुहीति॥ १५९॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक! तुम ठीक समय पर ठीक स्थान पर आये हो। पुत्र! तुम्हारा स्वागत है। अच्छा हुआ कि मैंने तुम्हें बिना किसी दोष के शाप नहीं दिया। तुम्हारा कल्याण निकट है, तुम्हें सफलता मिले।॥159॥
 
‘Uttank! You have come to the right place at the right time. Son! You are welcome. It is good that I did not curse you without any fault. Your welfare is near, may you achieve success.'॥ 159॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)