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mahabharat 1.3.158: इतने में ही उत्तंकने उपाध्यायके घरमें जाकर अपनी गुरुपत्नीको प्रणाम करके दोनों कुण्डल दे दिये। तब गुरुपत्नीने उत्तंकसे कहा - 158॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  1.3.158 
अथ तस्मिन्नन्तरे स उत्तङ्क: प्रविश्य उपाध्यायकुलमुपाध्यायानीमभ्यवादयत् ते चास्यै कुण्डले प्रायच्छत् सा चैनं प्रत्युवाच॥ १५८॥
 
 
अनुवाद
इतने में ही उत्तंकने उपाध्यायके घरमें जाकर अपनी गुरुपत्नीको प्रणाम करके दोनों कुण्डल दे दिये। तब गुरुपत्नीने उत्तंकसे कहा - 158॥
 
Meanwhile, Uttankane entered Upadhyay's house and bowed to his Guru's wife and gave her both the earrings. Then Guru's wife said to Uttank - 158॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)